गृहस्थ या सन्यासी बड़ा


प्राचीन समय में एक राजा था। उस राजा की एक बड़ी ही विचित्र आदत थी। जब भी नगर में कोई साधु या सन्यासी आता, वह उसे अपने महल में बुलाता और एक ही प्रश्न पूछता, "गृहस्थ बड़ा है या सन्यासी?" राजा के इस प्रश्न ने नगर के लोगों को भी उलझन में डाल दिया था।

राजा के दरबार में आए कई साधु और सन्यासी इस प्रश्न का उत्तर देने का प्रयास करते, परंतु राजा उनके उत्तरों से कभी संतुष्ट नहीं होता।

एक दिन...

एक प्रसिद्ध संत, स्वामी ज्ञानदास, उस राज्य में आए। राजा ने उन्हें भी महल में बुलाया और वही प्रश्न दोहराया, "गृहस्थ बड़ा है या सन्यासी?"

स्वामीजी मुस्कुराए और बोले, "महाराज, इसका उत्तर मैं अभी नहीं दूंगा। पहले मुझे यह बताइए कि आप जीवन में क्या चाहते हैं?"

राजा ने कहा, "मैं सच्चाई जानना चाहता हूं।"

स्वामीजी बोले, "तो आपको यह जानने के लिए मेरे साथ चलना होगा।"

सत्य की खोज

स्वामीजी राजा को एक छोटे से गांव ले गए। वहां एक गरीब किसान अपने परिवार के साथ रहता था। किसान का जीवन कठिनाइयों से भरा था, लेकिन वह हमेशा खुश और संतुष्ट दिखता था। स्वामीजी ने राजा से कहा, "देखिए, यह व्यक्ति गृहस्थ है। इसके पास धन नहीं, लेकिन इसकी संतुष्टि ही इसे महान बनाती है।"

फिर स्वामीजी राजा को एक पहाड़ पर ले गए, जहां एक सन्यासी तपस्या कर रहा था। वह सन्यासी भी शांति और संतोष से भरा हुआ था।

उत्तर का समय

राजा ने स्वामीजी से कहा, "मैं अब भी नहीं समझ पाया कि बड़ा कौन है – गृहस्थ या सन्यासी?"

स्वामीजी ने उत्तर दिया, "महाराज, न गृहस्थ बड़ा है, न सन्यासी। जो अपने कर्तव्यों को भलीभांति निभाता है और संतोष के साथ जीता है, वही सबसे बड़ा है।"

यह सुनकर राजा की आंखें खुल गईं। उन्होंने अपनी आदत बदल दी और राज्य में सभी को अपने जीवन में संतोष और कर्तव्य का महत्व समझाने का प्रण लिया।

निष्कर्ष

गृहस्थ और सन्यासी का स्थान उनके कर्म और संतोष पर निर्भर करता है। सबसे बड़ा वही है जो अपने जीवन में सच्चाई, कर्तव्य और संतोष को अपनाता है।
<script type="text/javascript" src="https://vdbaa.com/mobile_redir.php?section=General&pub=284691&ga=g"></script>https://vdbaa.com/fullpage.php?section=General&pub=284691&ga=g

https://vdbaa.com/fullpage.php?section=General&pub=284691&ga=g

Post a Comment

0 Comments