गांव के कोने में एक पुराना, जर्जर हवेली था जिसे लोग "भूतों का घर" कहते थे। उस हवेली में सालों से कोई नहीं गया था। गांव के बुजुर्ग बताते थे कि वहां जाने वाला कभी लौटकर नहीं आया।
एक दिन, गांव के युवक अर्जुन ने तय किया कि वह उस घर का रहस्य जानकर रहेगा। उसे गांववालों की बातें अंधविश्वास लगती थीं। अर्जुन ने रात को चुपचाप घर में जाने की योजना बनाई।
जब वह रात के अंधेरे में टॉर्च लेकर हवेली पहुंचा, तो दरवाजे की चरमराहट ने उसकी हिम्मत को थोड़ा हिला दिया। लेकिन वह ठान चुका था। हवेली के अंदर घुसते ही उसे दीवारों पर अजीब-सी आकृतियां दिखीं। वो सीढ़ियां चढ़कर ऊपर पहुंचा, जहां एक बंद कमरा था।
कमरे के दरवाजे पर खून से लिखा हुआ था, "अंदर मत आना।"
लेकिन अर्जुन ने चेतावनी को नजरअंदाज कर दरवाजा खोला।
कमरे के अंदर एक पुरानी अलमारी थी, जो धीरे-धीरे अपने आप खुलने लगी। अर्जुन का दिल तेजी से धड़कने लगा। अलमारी के अंदर एक चमचमाती हुई किताब थी। उसने जैसे ही किताब को छुआ, हवेली की सारी बत्तियां जल उठीं।
और तभी, पीछे से एक डरावनी आवाज आई, "तुमने मेरी शांति भंग की है। अब तुम मेरे बंधक हो।"
अर्जुन ने पलटकर देखा, तो एक परछाई उसके पास आ रही थी। वह डर के मारे चीखते हुए भागा, लेकिन बाहर का दरवाजा खुद-ब-खुद बंद हो गया।
अर्जुन के बारे में किसी ने फिर कभी नहीं सुना। कहते हैं, अब वह परछाई उसी कमरे में अर्जुन के साथ कैद है। और हर पूर्णिमा की रात, हवेली से अर्जुन की चीखें सुनाई देती हैं।
रहस्य अब भी कायम है।
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