क्या हैं और उनका काम क्या है?
भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने प्रकृति और जीव के संबंध को बहुत गहराई से समझाया है। सातवें अध्याय में श्रीकृष्ण अपनी दो प्रकृतियों—अपरा प्रकृति और परा प्रकृति का वर्णन करते हैं। इन दोनों को समझने से यह समझने में मदद मिलती है कि संसार, शरीर और चेतना का आपस में क्या संबंध है।
1. अपरा प्रकृति क्या है?
भगवान श्रीकृष्ण भगवद्गीता के सातवें अध्याय के चौथे श्लोक में अपनी आठ प्रकार की प्रकृति बताते हैं:
पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार।
इन्हें भगवान की अपरा प्रकृति कहा गया है।
सरल भाषा में समझें तो यह वह भौतिक प्रकृति है जिससे संसार के शरीर और भौतिक वस्तुओं का निर्माण होता है।
अपरा प्रकृति का काम क्या है?
अपरा प्रकृति के माध्यम से भौतिक संसार की रचना और संचालन होता है।
- पृथ्वी से शरीर और अनेक पदार्थों को स्थूल आधार मिलता है।
- जल जीवन और शरीर के लिए आवश्यक है।
- अग्नि ऊर्जा और परिवर्तन का आधार है।
- वायु जीवन की अनेक शारीरिक प्रक्रियाओं में सहायक है।
- आकाश सभी वस्तुओं को स्थान देता है।
- मन विचार और भावनाओं से संबंधित है।
- बुद्धि निर्णय और विवेक का माध्यम है।
- अहंकार व्यक्ति में “मैं” और “मेरा” की भावना उत्पन्न करता है।
इस प्रकार अपरा प्रकृति केवल मिट्टी-पत्थर जैसी भौतिक चीजों तक सीमित नहीं है; गीता में मन, बुद्धि और अहंकार को भी प्रकृति का हिस्सा बताया गया है।
2. परा प्रकृति क्या है?
भगवान श्रीकृष्ण अगले श्लोक में अपनी दूसरी प्रकृति को परा प्रकृति बताते हैं। इसे जीवभूत, अर्थात जीवों में स्थित चेतन तत्व, कहा गया है।
सरल शब्दों में कहें तो परा प्रकृति चेतना का सिद्धांत है।
जहाँ अपरा प्रकृति शरीर और भौतिक व्यवस्था का आधार है, वहीं परा प्रकृति जीवों में जीवन और चेतना का आधार मानी जाती है।
परा प्रकृति का काम क्या है?
परा प्रकृति के कारण जीवित प्राणी केवल निर्जीव पदार्थों का समूह नहीं रह जाता।
जीव में दिखाई देने वाली जीवन-चेतना, अनुभव करने की क्षमता और कर्म करने की प्रवृत्ति को समझने में परा प्रकृति की अवधारणा महत्वपूर्ण है।
उदाहरण के लिए हमारे सामने दो शरीर रखे हों—एक जीवित और दूसरा मृत। दोनों के भौतिक अंग कुछ समय तक लगभग समान दिखाई दे सकते हैं, लेकिन जीवित शरीर में जीवन की गतिविधियाँ चलती हैं।
गीता इसी अंतर को समझने के लिए चेतन तत्व की बात करती है।
दोनों प्रकृतियाँ मिलकर क्या करती हैं?
भगवान श्रीकृष्ण के अनुसार ये दोनों प्रकृतियाँ मिलकर संसार की व्यवस्था को समझने का आधार देती हैं।
अपरा प्रकृति = भौतिक प्रकृति
परा प्रकृति = चेतन जीव-तत्व
एक सरल उदाहरण से समझें:
शरीर = अपरा प्रकृति का क्षेत्र
जीवन/चेतना = परा प्रकृति से संबंधित तत्व
क्या ईश्वर प्रकृति से अलग हैं?
गीता में श्रीकृष्ण स्वयं को इन दोनों प्रकृतियों का आधार बताते हैं। इसलिए प्रकृति को स्वतंत्र और सर्वोच्च सत्ता मानना गीता की शिक्षा नहीं है।
भगवान प्रकृति के स्वामी और आधार हैं, जबकि प्रकृति उनके अधीन कार्य करती है।
गीता में आगे कहा गया है कि संसार की समस्त वस्तुएँ इन प्रकृतियों से उत्पन्न होती हैं और भगवान ही उनके मूल कारण हैं।
मनुष्य के जीवन में इसका क्या महत्व है?
यदि मनुष्य स्वयं को केवल शरीर मानता है तो उसका ध्यान केवल भौतिक सुख, धन, शरीर और इच्छाओं पर रह सकता है।
लेकिन गीता मनुष्य को यह समझाने का प्रयास करती है कि उसके अस्तित्व का एक चेतन और आध्यात्मिक पक्ष भी है।
इस समझ से मनुष्य अपने शरीर, मन और बुद्धि का बेहतर उपयोग करने तथा अपने वास्तविक स्वरूप को जानने की दिशा में आगे बढ़ सकता है।
निष्कर्ष
भगवद्गीता के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण की दो प्रमुख प्रकृतियाँ हैं—अपरा प्रकृति और परा प्रकृति।
अपरा प्रकृति में पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार आते हैं। यह भौतिक संसार और शरीर की व्यवस्था का आधार है।
परा प्रकृति जीवभूत चेतन तत्व है, जो जीवों के जीवन और चेतना से संबंधित है।
इसलिए सरल शब्दों में कहा जा सकता है:
“अपरा प्रकृति शरीर और संसार का भौतिक आधार है, जबकि परा प्रकृति जीव में चेतना का तत्व है। दोनों का मूल आधार भगवान श्रीकृष्ण हैं।”
यही भगवद्गीता की प्रकृति संबंधी शिक्षा को समझने का एक सरल मार्ग है।
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