बहुत समय पहले की बात है। एक घने जंगल में एक तोता और एक मैना रहते थे। दोनों में इतना गहरा प्रेम था कि जंगल के बाकी पक्षी उनकी दोस्ती की मिसाल दिया करते थे। वे साथ उड़ते, साथ दाना चुगते और हर सुख-दुख में एक-दूसरे का साथ निभाते।
लेकिन एक दिन छोटी-सी बात पर दोनों के बीच विवाद हो गया। बात इतनी बढ़ गई कि झगड़े में बदल गई। क्रोध में आकर तोते ने कहा,
“इस संसार में सबसे बड़ा पापी और विश्वासघाती तुम हो!”
मैना को यह बात बहुत बुरी लगी। उसने भी जवाब दिया,
“नहीं, सबसे बड़ा विश्वासघाती तुम हो!”
दोनों अपने-अपने तर्क देने लगे, लेकिन किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पाए। आखिरकार उन्होंने निर्णय लिया कि इस प्रश्न का उत्तर किसी ज्ञानी से पूछा जाए।
उसी जंगल के पास एक प्राचीन शिव मंदिर था, जहाँ स्वयं भगवान शिव की आराधना होती थी। दोनों पक्षी वहाँ पहुँचे और भगवान शिव के सामने अपना विवाद रख दिया।
दोनों की बातें सुनकर भगवान शिव मुस्कुराए और बोले,
“तुम दोनों में से कोई भी सबसे बड़ा विश्वासघाती नहीं है।”
तोता और मैना आश्चर्यचकित होकर बोले,
“तो फिर प्रभु, इस संसार में सबसे बड़ा विश्वासघाती कौन है?”
भगवान शिव ने शांत स्वर में उत्तर दिया,
“इस संसार में सबसे बड़ा विश्वासघाती मनुष्य का अपना ‘मन’ है।”
दोनों पक्षी हैरान रह गए। उन्होंने पूछा,
“प्रभु, यह कैसे संभव है?”
भगवान शिव बोले,
“मनुष्य का मन ही उसे अच्छे-बुरे रास्तों पर ले जाता है। जब मन सही दिशा में होता है, तो वही मनुष्य को महान बनाता है। लेकिन जब मन भटक जाता है, तो वही मनुष्य अपने ही विश्वास, अपने ही रिश्तों और अपने ही धर्म के साथ विश्वासघात कर बैठता है।”
“मन ही मित्र है और मन ही शत्रु। यदि मन पर नियंत्रण न हो, तो इंसान अपने सबसे प्रिय लोगों को भी धोखा दे सकता है।”
भगवान शिव की यह बात सुनकर तोता और मैना दोनों को अपनी गलती का एहसास हुआ। उन्होंने समझ लिया कि उनका झगड़ा भी उनके मन के कारण ही हुआ था।
दोनों ने एक-दूसरे से क्षमा मांगी और फिर से पहले की तरह प्रेमपूर्वक रहने लगे।
सीख:
मनुष्य का सबसे बड़ा मित्र और सबसे बड़ा शत्रु उसका अपना मन ही होता है। यदि हम अपने मन को नियंत्रित कर लें, तो जीवन में कभी भी विश्वासघात नहीं होगा।
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