एक दिन अयोध्या में भगवान श्रीराम अपने भक्त हनुमान जी के साथ बैठे हुए थे। प्रभु के मन में हनुमान के प्रति अपार प्रेम और कृतज्ञता थी। राम जी सोच रहे थे कि हनुमान ने उनके लिए कितने महान कार्य किए हैं, लेकिन फिर भी उन्हें कोई पद या राज्य नहीं मिला।
श्रीराम जी ने मुस्कुराते हुए हनुमान जी से कहा,
“हनुमान! मैंने तुम्हें अब तक कोई पद नहीं दिया। मैं चाहता हूँ कि तुम्हें भी कोई अच्छा सा पद दे दूँ। क्योंकि तुम्हारी वजह से ही सुग्रीव को किष्किन्धा का राज्य मिला, विभीषण को लंका का राज्य मिला और मुझे भी तुम्हारी सहायता के कारण अयोध्या का राज्य मिला। परन्तु तुम्हें कोई पद नहीं मिला।”
हनुमान जी ने विनम्रता से प्रभु की ओर देखा और मुस्कुराते हुए बोले,
“प्रभु! सबसे अधिक लाभ में तो मैं ही हूँ।”
राम जी ने आश्चर्य से पूछा,
“वह कैसे, हनुमान?”
हनुमान जी ने हाथ जोड़कर कहा,
“प्रभु! सुग्रीव को किष्किन्धा का एक पद मिला, विभीषण को लंका का एक पद मिला और आपको भी अयोध्या का एक ही पद मिला। लेकिन मुझे तो आपके दो-दो पद मिले हैं।”
इतना कहकर हनुमान जी ने प्रेम और भक्ति से भरकर भगवान श्रीराम के चरणों में अपना सिर रख दिया और बोले,
“प्रभु! जिसे आपके ये दो पवित्र चरण मिल जाएँ, वह किसी और पद की इच्छा क्यों करेगा?”
हनुमान जी की यह गहरी भक्ति और विनम्रता देखकर भगवान श्रीराम अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने हनुमान को अपने हृदय से लगा लिया।
इस कथा की शिक्षा
यह कथा हमें सिखाती है कि सच्चे भक्त के लिए प्रभु के चरणों की सेवा ही सबसे बड़ा पद होता है।
भक्ति, प्रेम और समर्पण से बड़ा कोई पद या सम्मान नहीं होता।
सुंदर चौपाई
सब के ममता ताग बटोरी।
मम पद मनहि बाँधि वर डोरी ॥
अर्थ:
सभी सांसारिक मोह-माया के धागों को समेटकर अपने मन को भगवान के चरणों से बाँध लेना ही सबसे बड़ा वरदान है।
🙏 जय श्री राम
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