एक बार एक किसान सर्दियों के दिनों में अपने खेतों से होकर गुजर रहा था। कड़ाके की ठंड पड़ रही थी। तभी उसकी नज़र एक साँप पर पड़ी जो ठंड के कारण बिल्कुल अकड़ा हुआ पड़ा था। वह हिलने-डुलने में भी असमर्थ था।
किसान जानता था कि साँप बहुत ही विषैला और खतरनाक जीव होता है, फिर भी उसके मन में दया आ गई। उसने सोचा,
“यह भी तो भगवान की ही बनाई हुई एक जीव है। ठंड से मर जाएगा।”
यह सोचकर किसान ने उस साँप को उठाया और अपनी ओढ़नी (चादर) में लपेटकर घर ले आया। घर पहुँचकर उसने साँप को आग के पास रख दिया ताकि उसे गर्मी मिल सके।
थोड़ी देर बाद गर्मी पाते ही साँप में जान आने लगी। वह धीरे-धीरे फन उठाने लगा। किसान यह देखकर खुश हुआ कि उसने एक प्राणी की जान बचा ली।
लेकिन जैसे ही साँप पूरी तरह स्वस्थ हुआ, उसने अपनी असली प्रकृति दिखा दी। उसने फुफकार मारी और अचानक किसान को डस लिया।
किसान दर्द से तड़पने लगा। मरते समय उसने दुःखी होकर कहा,
“मैंने तुझ पर दया की, तुझे जीवन दिया, फिर भी तूने मुझे ही डस लिया!”
साँप बोला,
“मेरी प्रकृति ही विष उगलना है। तुम जानते थे कि मैं साँप हूँ, फिर भी तुमने मुझ पर दया की। इसमें मेरा क्या दोष?”
यह कहकर साँप वहाँ से चला गया और किसान वहीं दम तोड़ देता है।
कहानी की सीख (नैतिक शिक्षा)
👉 दुष्ट स्वभाव वाले व्यक्ति पर की गई दया भी कभी-कभी विनाश का कारण बन जाती है।
👉 हर किसी पर भरोसा करना ठीक नहीं होता।
👉 जिसकी प्रकृति जैसी होती है, वह वैसी ही रहती है।
अगर चाहें तो मैं इस कहानी का
ब्लॉग पोस्ट,
बच्चों के लिए सरल संस्करण,
या इमेज प्रॉम्प्ट (English में) भी बना सकता हूँ
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