बच्चे की एक बात और संत का बोध


समुद्र तट पर एक सिद्ध महान् संत टहल रहे थे। लहरों की गर्जना और ठंडी हवा के बीच उन्होंने देखा कि एक छोटा-सा बालक ज़ोर-ज़ोर से रो रहा है। संत करुणा से भर उठे। वे उसके पास आए, प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरा और बोले—
“बेटा, तुम क्यों रो रहे हो?”
बालक ने अपनी मासूम आँखों से संत की ओर देखा और कहा—
“बाबा, मैं इस छोटे से प्याले में पूरा समुद्र भरना चाहता हूँ, लेकिन यह समुद्र मेरे प्याले में समा ही नहीं रहा।”
बालक की यह बात सुनकर संत विस्मय में पड़ गए। उनकी आँखों से आँसू बहने लगे। यह देखकर बालक चकित हुआ और बोला—
“आप भी मेरी तरह रोने लगे, लेकिन आपका प्याला कहाँ है?”
संत ने गहरी साँस लेते हुए उत्तर दिया—
“बेटा, तुम छोटे से प्याले में समुद्र भरना चाहते हो और मैं अपनी छोटी-सी बुद्धि में पूरे संसार का ज्ञान भरना चाहता हूँ। आज तुम्हें देखकर समझ आया कि जैसे समुद्र प्याले में नहीं समा सकता, वैसे ही अनंत ज्ञान सीमित बुद्धि में नहीं समा सकता।”
यह सुनते ही बालक ने अचानक अपना प्याला ज़ोर से समुद्र में फेंक दिया और मुस्कराकर बोला—
“अगर सागर मेरे प्याले में नहीं समा सकता, तो मेरा प्याला तो सागर में समा सकता है।”
बालक की यह बात सुनकर संत भाव-विभोर हो गए। वे तुरंत उस बालक के चरणों में गिर पड़े और बोले—
“बेटा, आज तुमने वह महान सत्य कह दिया है, जिसे बड़े-से-बड़ा ज्ञानी भी शब्दों में नहीं समझा पाता।”
तभी संत के मुख से निकला—
“इसीलिए कहा गया है कि बच्चों के मुख में सरस्वती का वास होता है।”
अंत में संत ने हाथ जोड़कर प्रार्थना की—
“हे परमात्मा! आपका ज्ञान-सरोवर मुझमें नहीं समा सकता,
पर मैं तो आप में पूर्ण रूप से लीन हो सकता हूँ।”<script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-9937615590363233"
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🌺 कथा से शिक्षा
सीमित बुद्धि में अनंत ज्ञान नहीं समा सकता
अहंकार छोड़कर समर्पण ही सच्चा ज्ञान है
ईश्वर को जानने से अधिक, ईश्वर में लीन होना ही परम लक्ष्य है

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