एक घने जंगल में एक चकोर रहता था। उसका छोटा-सा घर एक बड़े पेड़ की खोह में था। वह वहीं रहता, वहीं सोता और उसी जगह को अपना संसार मानता था। पास ही कई और पक्षी और जानवर रहते थे, जो उसे अच्छी तरह जानते थे।
एक दिन उसी पेड़ पर दूसरा चकोर आकर बैठा। बातचीत में उसने बताया—
“मैं दूर के खेतों से आ रहा हूँ। वहाँ एक चीज़ मिलती है— अनाज। उसका स्वाद इतना अद्भुत है कि जीवन भर नहीं भूल सकते।”
यह सुनकर पहला चकोर सोच में पड़ गया। उसने आज तक सिर्फ जंगल के फल-बीज ही खाए थे। उसके मन में जिज्ञासा जागी—
“क्या सचमुच अनाज इतना स्वादिष्ट होता है?”
दूसरे चकोर के उड़ जाने के बाद वह देर तक सोचता रहा। अंत में उसने फैसला किया—
“कल मैं भी उन दूर दिखने वाले खेतों की ओर जाऊँगा और उस अनाज का स्वाद चखूँगा।”
खेतों का मोह
अगले दिन चकोर उड़ता हुआ खेतों के पास पहुँचा। वहाँ धान की फसल लहलहा रही थी। उसने धान की कोमल कोंपलें खाईं। स्वाद ऐसा था कि वह मंत्रमुग्ध हो गया।
“वाह! इतना स्वादिष्ट भोजन तो मैंने कभी नहीं खाया,”
यह सोचकर वह रोज वहीं आने लगा।
खाता, पीता और तृप्त होकर वहीं आँखें मूँदकर सो जाता। दिन कैसे बीत गए, उसे पता ही नहीं चला। छः-सात दिन यूँ ही गुजर गए।
घर की याद
एक दिन अचानक उसे अपनी खोह की याद आई।
“अरे! मैं तो अपना घर भूल ही गया। मुझे लौटना चाहिए।”
वह तुरंत उड़कर वापस अपने पेड़ की ओर चला।
नया कब्ज़ा
उसी दौरान एक खरगोश उस इलाके में भटक रहा था। लगातार बारिश के कारण जमीन के नीचे पानी भर गया था और उसका बिल नष्ट हो चुका था। नया ठिकाना खोजते-खोजते वह उसी पेड़ के पास पहुँचा।
खोह खाली देखकर उसने सोचा—
“यह जगह तो बिल्कुल सुरक्षित है।”
उसने वहीं रहना शुरू कर दिया।
विवाद
जब चकोर वापस पहुँचा, तो यह देखकर स्तब्ध रह गया कि उसकी खोह में कोई और रह रहा है।
क्रोधित होकर वह बोला—
“ऐ भाई! तू कौन है और मेरे घर में क्या कर रहा है?”
खरगोश दाँत दिखाकर बोला—
“मैं इस घर का मालिक हूँ। सात दिन से यहाँ रह रहा हूँ। यह घर अब मेरा है।”
चकोर गुस्से से बोला—
“सात दिन! मैं इस खोह में कई वर्षों से रह रहा हूँ। आस-पास के किसी भी पक्षी या जानवर से पूछ लो।”
दोनों में झगड़ा बढ़ने लगा।
न्याय
तभी वहाँ से एक बूढ़ा कछुआ गुजर रहा था। दोनों ने उसे अपना न्यायाधीश बना लिया।
कछुए ने ध्यान से पूरी बात सुनी और कहा—
“पहले जैसी स्थिति दिखाओ।”
चकोर खोह के अंदर चला गया, फिर बाहर आया।
कछुए ने फैसला सुनाया—
“जिसने वर्षों तक घर बनाया और संभाला, वही इसका असली मालिक है। कुछ दिनों के लालच में घर छोड़ना भूल थी, पर अधिकार चकोर का ही है।”
खरगोश को अपनी गलती समझ आ गई। उसने माफी माँगी और वहाँ से चला गया।
सीख
चकोर को भी जीवन की बड़ी सीख मिली—
स्वाद और सुविधा के लोभ में अपने कर्तव्य और घर को नहीं छोड़ना चाहिए।
कहानी की सीख (नीति):
👉 लालच मनुष्य को उसके मूल से दूर कर देता है।
👉 जो अपना है, उसकी कद्र करनी चाहिए।
👉 क्षणिक सुख स्थायी नुकसान दे सकता है।
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