भगवान भूतनाथ की भक्ति और शबरी का अद्भुत त्याग


प्राचीन काल की बात है। एक वन में शबर नाम का एक साधारण, किंतु अत्यंत श्रद्धालु भक्त अपनी पत्नी शबरी के साथ रहता था। दोनों का जीवन अत्यंत सादा था, परंतु उनके हृदय में भगवान भूतनाथ (श्रीशिव) के प्रति अगाध भक्ति थी। शबर प्रतिदिन नियमपूर्वक भगवान की पूजा करता था, परंतु पूजा के लिए आवश्यक चिताभस्म का अभाव उसे भीतर ही भीतर चिंतित किए रहता था।
https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-9937615590363233एक दिन शबर को अत्यधिक चिंतित देखकर उसकी पत्नी शबरी ने स्नेहपूर्वक कहा—
“नाथ! आप व्यर्थ चिंता न करें। एक उपाय है। यह घर अब बहुत पुराना हो चुका है। यदि मैं इसमें आग लगाकर उसी अग्नि में प्रवेश कर जाऊँ, तो इससे आपकी पूजा के लिए पर्याप्त चिताभस्म तैयार हो जाएगी।”
यह सुनकर शबर विचलित हो उठा। उसने बहुत समझाया, बहुत वाद-विवाद हुआ, परंतु शबरी का संकल्प अडिग था। अंततः, पति की अनुमति पाकर शबरी ने स्नान किया, शुद्ध वस्त्र धारण किए और उस कुटिया में अग्नि प्रज्वलित की। उसने अग्नि की तीन बार परिक्रमा की, अपने पति को नमस्कार किया और हृदय में सदाशिव भगवान का ध्यान करते हुए अग्नि में प्रवेश कर गई। क्षणभर में वह भस्म हो गई।
शबर ने उसी भस्म से भगवान भूतनाथ की विधिपूर्वक पूजा की। उसका मन पूर्णतः श्रद्धा में डूबा था, इसलिए उसे किसी प्रकार का विषाद नहीं हुआ। पूजा समाप्त होने पर वह स्वभाववश अपनी पत्नी को प्रसाद देने के लिए पुकारने लगा।
आश्चर्य!
https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-9937615590363233स्मरण करते ही शबरी तुरंत उसके सामने आ खड़ी हुई।
अब शबर को स्मरण आया कि उसकी पत्नी तो अग्नि में प्रवेश कर चुकी थी। वह विस्मय से भर उठा और बोला—
“यह कैसे संभव है? तुम और यह घर तो जल चुके थे, फिर यह सब कैसे?”
https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-9937615590363233शबरी मुस्कराकर बोली—
“नाथ! जब मैं अग्नि में प्रविष्ट हुई, तो मुझे ऐसा लगा जैसे मैं जल में प्रवेश कर रही हूँ। एक क्षण को गहरी निद्रा-सी अनुभूति हुई और फिर मैं जाग गई। जागने पर देखा कि यह घर भी पूर्ववत् खड़ा है। मैं तो केवल प्रसाद लेने आई हूँ।”
शबर-दम्पति अभी इस अद्भुत घटना पर विचार ही कर रहे थे कि तभी उनके सामने एक दिव्य विमान प्रकट हुआ। उस विमान में भगवान के चार गण विराजमान थे। उन्होंने दोनों को स्पर्श किया और विमान पर बैठा लिया। स्पर्श मात्र से ही शबर और शबरी के शरीर दिव्य हो गए।
https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-9937615590363233विमान उन्हें शिवलोक की ओर ले चला।
इस प्रकार यह सिद्ध हुआ कि सच्ची श्रद्धा और निष्काम भक्ति में वह सामर्थ्य है, जो असंभव को भी संभव बना देती है। भगवान की आराधना यदि पूर्ण विश्वास और समर्पण से की जाए, तो भक्त का कल्याण निश्चित है।

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