नंदू और पाताल लोक की सर्पकन्या


एक बार की बात है। एक नगर में एक बहुत बड़ा साहुकार रहता था। उसके चार पुत्र थे। साहुकार का पुश्तैनी व्यापार बहुत प्रसिद्ध था। उसके तीन बड़े बेटे समझदार, मेहनती और व्यापार में निपुण थे। वे अपने पिता के काम के साथ-साथ अलग-अलग धंधे भी संभालते थे।
लेकिन चौथा और सबसे छोटा बेटा नंदू बिल्कुल अलग स्वभाव का था।
न वह व्यापार में रुचि लेता, न किसी काम-धंधे में। दिन भर कभी नदी किनारे बैठा रहता, कभी जंगल की ओर निकल जाता और कभी किसी पेड़ के नीचे बाँसुरी बजाता रहता। उसे धन-दौलत या वैभव से कोई लगाव नहीं था।
साहुकार इस बात से बहुत नाराज़ रहता। वह अक्सर नंदू को डाँटता और कहता—
“नालायक! तेरे भाई देख, कैसे घर का नाम रोशन कर रहे हैं और तू है कि दिन भर यूँ ही घूमता रहता है।”
नंदू चुपचाप सब सुन लेता, पर कुछ कहता नहीं।
वन की रहस्यमयी घटना
एक दिन नंदू यूँ ही घूमते-घूमते घने जंगल में पहुँच गया। वहाँ उसे एक पुराना कुआँ दिखाई दिया, जिससे अजीब-सी रोशनी निकल रही थी। उत्सुकतावश वह कुएँ के पास गया। तभी उसने किसी के रोने की आवाज़ सुनी।
“कोई है क्या?” नंदू ने पुकारा।
कुएँ के भीतर से एक मधुर स्वर आया—
“हे मानव! यदि तुम दयालु हो तो मेरी सहायता करो।”
नंदू ने झाँककर देखा। कुएँ के भीतर एक सुंदर कन्या बैठी थी, पर उसका आधा शरीर सर्प का था। नंदू तनिक भी भयभीत नहीं हुआ।
“डरो मत,” कन्या बोली, “मैं पाताल लोक की सर्पकन्या हूँ। एक तपस्वी के श्राप से मैं यहाँ फँस गई हूँ।”
दयालु नंदू
नंदू ने बिना देर किए रस्सी फेंकी और सर्पकन्या को बाहर निकाल लिया। बाहर आते ही धरती काँप उठी और एक दिव्य प्रकाश फैल गया। सर्पकन्या ने अपने वास्तविक रूप में आकर नंदू को प्रणाम किया।
“तुमने निस्वार्थ भाव से मेरी सहायता की है,” उसने कहा,
“मुझसे जो चाहो, माँग लो।”
नंदू बोला—
“मुझे कुछ नहीं चाहिए। बस मेरे पिता का क्रोध शांत हो जाए और वे मुझ पर विश्वास करें।”
सर्पकन्या मुस्कुराई।
“ऐसा ही होगा।”
पाताल लोक का वरदान
सर्पकन्या नंदू को पाताल लोक ले गई। वहाँ नागराज ने नंदू की दयालुता से प्रसन्न होकर उसे एक दिव्य मणि दी।
“यह मणि जहाँ रहेगी, वहाँ कभी धन-धान्य की कमी नहीं होगी,” नागराज बोले।
पल भर में नंदू वापस अपने घर के पास था।
परिवर्तन
कुछ ही दिनों में साहुकार का व्यापार दुगुना हो गया। धन, अन्न और सुख की वर्षा होने लगी। साहुकार को पता चला कि यह सब नंदू के कारण हुआ है।
उसने नंदू को गले लगाकर कहा—
“बेटा, मैंने तुझे गलत समझा। सच्चा धन मेहनत से नहीं, अच्छे कर्मों से आता है।”
नंदू मुस्कुराया, पर उसने कभी अपने वरदान का घमंड नहीं किया।
कहानी की सीख
👉 सच्ची संपत्ति दया, करुणा और निस्वार्थता में होती है।
👉 जो दूसरों की मदद करता है, ईश्वर स्वयं उसकी सहायता करता है।

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