बहुत समय पहले की बात है। एक गाँव के पास एक नदी बहती थी। उसी नदी के किनारे एक बगुला रहता था। नदी में मछलियाँ भरपूर थीं, इसलिए उसका जीवन आराम से चल रहा था।
लेकिन कुछ वर्षों बाद वर्षा कम होने लगी। धीरे-धीरे नदी का पानी घटने लगा। मछलियाँ भी कम होती गईं। बगुला रोज नदी के किनारे खड़ा होकर सोचता—
“अगर नदी पूरी तरह सूख गई तो मैं क्या खाऊँगा?”
चालाकी की शुरुआत
एक दिन बगुले के दिमाग में एक उपाय आया। उसने नदी की मछलियों से कहा—
“बहनों! थोड़ी दूरी पर एक बड़ा और गहरा तालाब है। अगर तुम चाहो तो मैं एक-एक करके तुम्हें वहाँ पहुँचा सकता हूँ, वरना यहाँ सब मर जाओगी।”
मछलियाँ डर गईं और बगुले की बातों में आ गईं। रोज वह एक मछली को अपनी चोंच में उठाकर ले जाता और रास्ते में खा जाता।
केकड़े की समझदारी
नदी में एक बुद्धिमान केकड़ा भी रहता था। उसने बगुले की बातों पर शक किया और कहा—
“अगर तालाब सच में है, तो मुझे भी दिखाओ।”
बगुला केकड़े को लेकर उड़ा, लेकिन रास्ते में केकड़े ने जमीन पर मछलियों की हड्डियाँ देख लीं। उसे सब समझ आ गया।
न्याय
केकड़े ने चुपचाप अपनी पकड़ मजबूत की और बगुले की गर्दन पकड़ ली। जैसे ही बगुला जमीन पर उतरा, केकड़े ने उसकी गर्दन तोड़ दी।
इस तरह नदी की बाकी मछलियाँ बच गईं।
कहानी की सीख (नीति):
👉 मीठी बातों में आकर आँख बंद भरोसा नहीं करना चाहिए।
👉 बुद्धि और सतर्कता से बड़ी से बड़ी चालाकी को हराया जा सकता है।
👉 लालच और छल का अंत बुरा होता है।
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