मोरपंख की सेवा


एक दिन राधा जी ने श्रीकृष्ण के मुकुट में सजे मोरपंख से हँसते हुए पूछा—
“हे मोरपंख! तू ही क्यों श्रीकृष्ण के शीश पर सदा विराजमान रहता है? हम सब तो उनकी एक झलक को तरसते हैं।”
मोरपंख ने बड़े विनम्र भाव से कहा—
“हे राधे! मेरी क्या बड़ाई। मैं तो वन में मोरों के बीच पड़ा एक साधारण पंख था। न रूप का अभिमान, न रंग का घमंड।
बस जब भी श्रीकृष्ण वन में आते, मैं मौन होकर उनकी बाँसुरी की धुन सुनता और भीतर-ही-भीतर ‘कृष्ण… कृष्ण…’ करता रहता।”
“एक दिन,” मोरपंख बोला,
“उस नटवर की दृष्टि मुझ पर पड़ी। उन्होंने मुझे उठाया, मेरे पूरे कुल से अलग कर दिया। मैं अब उड़ नहीं सकता था, मेरे पाँव नहीं थे, मेरी स्वतंत्रता चली गई—
पर मैंने कोई शिकायत नहीं की, बस ‘कृष्ण… कृष्ण…’ करता रहा।”
“फिर उन्होंने मुझे अपने मुकुट में बाँध दिया। अब न मैं आकाश देख सकता था, न धरती—
पर मैं उनके सबसे समीप था।
धूप लगी, वर्षा लगी, युद्धों की धूल जमी—
पर मैंने कभी स्थान बदलने की इच्छा नहीं की।”
मोरपंख की आँखें नम हो गईं—
“तब एक दिन श्रीकृष्ण ने मुस्कराकर कहा—
‘तू नाच छोड़ आया, उड़ान छोड़ आया, अभिमान छोड़ आया—
इसलिए तू मेरे शीश पर स्थान पाएगा।’”
मोरपंख ने अंत में कहा—
“राधे! जो अपना अहंकार, इच्छा और सुविधा छोड़ देता है,
वही प्रभु के सबसे निकट रहता है।”
भावार्थ
जो स्वयं को खाली कर देता है,
उसे ही ईश्वर अपने से भर देते हैं।
जय जय श्री राधे 🌸
श्रीकृष्ण चरणों में नमन 🙏

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