दोपहर की तेज धूप थी।
मंदिर के सामने की सड़क तप रही थी।
वहीं एक छोटा-सा बच्चा नंगे पाँव खड़ा फूल बेच रहा था।
उसके पैरों के नीचे जलती हुई डामर की सड़क थी और सामने खड़े लोग फूलों के दाम पर मोलभाव कर रहे थे।
उसी भीड़ में एक सज्जन की नज़र उस बच्चे के पैरों पर पड़ी।
जलते हुए, लाल पड़े पैर देखकर उनका दिल भर आया।
वे बिना कुछ कहे तुरंत पास की एक दुकान की ओर भागे और एक जोड़ी जूते खरीद लाए।
सज्जन ने प्यार से कहा,
“बेटा, ये जूते पहन लो।”
बच्चे ने झटपट जूते पहने।
चेहरे पर ऐसी चमक आ गई, मानो सारी धूप ठंडी हो गई हो।
वह खुशी से उछल पड़ा, उस आदमी का हाथ पकड़ लिया और मासूमियत से बोला—
“आप भगवान हो…?”
सज्जन घबरा गए।
जल्दी से बोले,
“नहीं बेटा, नहीं… मैं भगवान नहीं हूँ।”
बच्चा मुस्कुराया और बोला—
“तो फिर आप जरूर भगवान के दोस्त होंगे…”
सज्जन चकित रह गए।
बच्चे ने आगे कहा—
“कल रात मैंने भगवान से प्रार्थना की थी कि
मेरे पैर बहुत जलते हैं,
भगवान जी, मुझे जूते दिला दो…”
यह सुनते ही उस आदमी की आँखें भर आईं।
वे मुस्कुराते हुए चुपचाप वहाँ से चले गए,
लेकिन आज उन्होंने एक बहुत बड़ी सच्चाई जान ली थी—
भगवान का दोस्त बनना ज्यादा मुश्किल नहीं होता।
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