बरगद के पेड़ के पास ही चट्टानों की खोह में कई खरगोश रहते थे। जैसे ही खरगोश बाहर निकलते, बाज ऊँची उड़ान भरता और झपट्टा मारकर किसी एक खरगोश को उठाकर ले जाता। यह दृश्य कौआ रोज़ देखा करता था।
एक दिन कौए ने सोचा— “ये खरगोश तो बहुत फुर्तीले हैं, मेरे हाथ आसानी से नहीं आएँगे। लेकिन अगर मैं भी बाज की तरह ऊपर से झपट्टा मारूँ, तो शायद मुझे भी उनका नर्म मांस खाने को मिल जाए।”
अगले दिन कौए ने बाज की नकल करने का निश्चय किया। वह भी बहुत ऊँचा उड़ने लगा और जैसे ही एक खरगोश दिखाई दिया, उसने बाज की तरह झपट्टा मार दिया।
लेकिन कौआ कहाँ और बाज कहाँ!
खरगोश ने उसे देख लिया और तुरंत भागकर एक बड़ी चट्टान के पीछे छिप गया। कौआ अपनी ही झोंक में तेज़ी से उड़ता हुआ सीधे चट्टान से टकरा गया। टक्कर इतनी ज़ोरदार थी कि उसकी गर्दन टूट गई और वह वहीं तड़प-तड़पकर मर गया।
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