https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-9937615590363233बहुत समय पहले की बात है। धरती पर धर्म धीरे-धीरे लुप्त हो रहा था। लोग सत्य, अहिंसा और प्रेम को भूलते जा रहे थे। पाप और अन्याय इतना बढ़ गया था कि साधु-संतों का जीवन कठिन हो गया था। राक्षस खुलेआम अधर्म का प्रचार कर रहे थे और निर्दोष लोगों पर अत्याचार कर रहे थे।
https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-9937615590363233इस स्थिति से दुखी होकर ऋषि-मुनियों ने गंगा किनारे एक यज्ञ किया और भगवान नारायण का आवाहन किया। यज्ञ की अग्नि से एक दिव्य प्रकाश निकला और भगवान विष्णु अपने शंख, चक्र, गदा और पद्म के साथ प्रकट हुए।
ऋषियों ने उनके चरणों में सिर झुकाकर कहा, “प्रभु! संसार में अधर्म की जड़ें गहरी हो गई हैं। असुरों ने धर्म की नींव हिला दी है। कृपा करके कोई उपाय बताइए जिससे पृथ्वी पर पुनः धर्म की स्थापना हो।”
https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-9937615590363233भगवान विष्णु बोले, “हे ऋषिगण! समय आने पर मैं स्वयं धरती पर अवतार लूंगा। मैं ‘नृसिंह’ रूप में प्रकट होकर हिरण्यकश्यप जैसे अत्याचारी को समाप्त करूंगा। फिर ‘राम’ और ‘कृष्ण’ रूपों में आकर धरती को पवित्र करूंगा। जब-जब अधर्म बढ़ेगा, तब-तब मैं अवतार लेकर धर्म की रक्षा करूंगा।”
सभी ऋषि-मुनि आनंद से भर गए। उन्होंने भगवान का धन्यवाद किया और धरती को आश्वस्त किया कि सत्य की हमेशा विजय होती हैhttps://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-993761559036323
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