सेठ जी की भक्ति और कान्हा की लीला
सेठ गोकुलदास जी भगवान श्रीकृष्ण के परम भक्त थे। उनका दिन-रात एक ही काम था—कृष्ण का नाम जपना और उनकी सेवा करना। सेठ जी का नियम था कि वे प्रतिदिन अपने हाथों से स्वादिष्ट पकवान बनाते और उन्हें मंदिर में जाकर श्रीकृष्ण को भोग लगाते।
हर दिन की तरह, उस दिन भी सेठ जी ने प्रेम और श्रद्धा से कई तरह के पकवान बनाए—माखन मिश्री, खीर, पूड़ी, मालपुए और भी बहुत कुछ। वे पूजा की थाली सजाकर मंदिर जाने को निकले, पर रास्ते में ही उन्हें अचानक भारी नींद आ गई। वे एक बड़े पेड़ के नीचे बैठ गए और थाली गोद में रखकर आंखें मूंद लीं।
थोड़ी ही देर में कुछ शरारती ग्वाले वहां आए। उन्होंने देखा कि सेठ जी सो रहे हैं और उनकी गोद में स्वादिष्ट पकवानों से भरी थाली रखी है। उन ग्वालों के मुंह में पानी आ गया। उन्होंने धीरे-धीरे थाली से मिठाइयां और पूड़ियां उठाकर खाना शुरू कर दिया।
जब सेठ जी की नींद खुली, तो उन्होंने देखा कि उनकी थाली खाली हो चुकी थी! वे बहुत दुखी हुए और रोते-रोते बोले, "हे कान्हा! मैं कितने प्रेम से आपके लिए भोग बनाकर लाया था, पर किसी ने इसे चुरा लिया। अब आपको क्या भोग लगाऊँ?"
तभी एक सुंदर नटखट बालक उनके सामने आया। उसके चेहरे पर मोहक मुस्कान थी, आंखों में शरारत थी, और हाथ में मक्खन लगा हुआ था। वह हंसते हुए बोला, "सेठ जी, भोग तो मुझ तक पहुंच ही गया! जब तुम सो गए, तो मेरे ग्वाले मित्रों को भूख लगी थी, इसलिए मैंने ही उन्हें खाने दिया। तुम दुखी मत हो, मैं तो सदा तुम्हारे प्रेम का भूखा हूँ, न कि पकवानों का!"
सेठ जी ने ध्यान से देखा—वह कोई साधारण बालक नहीं था, स्वयं श्रीकृष्ण थे! सेठ जी की आंखों से प्रेम के आंसू बहने लगे, और उन्होंने अपने प्रभु के चरण पकड़ लिए। कृष्ण जी ने उन्हें आशीर्वाद दिया और कहा, "सच्ची भक्ति भोजन से नहीं, प्रेम से होती है!"
इसके बाद सेठ जी ने समझ लिया कि भोग लगाना जरूरी नहीं, बल्कि सच्चे हृदय से भगवान को याद करना ही सबसे बड़ा भोग है। उन्होंने अपनी भक्ति को और भी दृढ़ किया और भगवान कृष्ण के प्रेम में ही जीवन बिता दिया।
"जय श्रीकृष्ण!"
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