प्राचीन समय की बात है। एक शक्तिशाली राजा था, जिसे अपने बल, बुद्धि और ऐश्वर्य पर बहुत घमंड था। वह स्वयं को सबसे श्रेष्ठ मानता था और अपने राज्य में किसी को भी अपने से ऊपर नहीं समझता था।
एक दिन, नारद मुनि राजा के दरबार में आए। राजा ने उनका स्वागत किया और बोला, "हे महर्षि! क्या संसार में मुझसे बड़ा और कोई है?"
नारद मुनि मुस्कुराए और बोले, "राजन! तुम बहुत महान हो, पर क्या तुम सच में सबसे श्रेष्ठ हो? अगर हां, तो मुझे यह प्रमाण चाहिए।"
राजा ने गर्व से कहा, "जो चाहें, मुझसे पूछ सकते हैं।"
नारद मुनि ने राजा से कहा, "तो एक कार्य करो। संसार में सबसे महान व्यक्ति को खोजो और मुझे बताओ कि वह कौन है।"
राजा ने यह चुनौती स्वीकार कर ली और अपनी सेना के साथ पूरे संसार में खोज करने निकल पड़ा। उसने शक्तिशाली राजाओं, ऋषियों, धनवानों और विद्वानों से मुलाकात की, पर हर कोई किसी और को अपने से बड़ा मानता था।
अंत में, राजा थककर लौट आया और नारद मुनि से बोला, "हे देवर्षि! मैं सारे संसार में गया, पर कोई भी यह नहीं कह सका कि वह सबसे श्रेष्ठ है। हर कोई किसी और को बड़ा मानता था।"
तब नारद मुनि मुस्कुराए और बोले, "राजन! यही संसार का नियम है। सच्चा महान व्यक्ति वह होता है, जो अहंकार को त्यागकर विनम्रता को अपनाता है। सबसे बड़ा वही होता है, जो खुद को सबसे छोटा मानता है।"
राजा को अपनी भूल का एहसास हुआ। उसने विनम्रता से नारद मुनि को प्रणाम किया और घमंड को त्यागकर प्रजा की भलाई के लिए कार्य करने लगा।
शिक्षा:
इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि अहंकार का कोई स्थान नहीं है। सच्ची महानता विनम्रता और दूसरों की सेवा में ही होती है।
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