भगवद गीता में श्रीकृष्ण ने आत्मा को अजर, अमर, अविनाशी और शाश्वत कहा है। गीता के दूसरे अध्याय (संख्यायोग) में आत्मा के गुणों का विस्तार से वर्णन किया गया है।
आत्मा के बारे में मुख्य श्लोक:
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"न जायते म्रियते वा कदाचित्
नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो
न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥" (गीता 2.20)अर्थ: आत्मा न तो जन्म लेती है, न मरती है। यह नित्य, अजर, अमर और पुरातन है। शरीर के नष्ट होने पर भी आत्मा नष्ट नहीं होती।
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"वासांसि जीर्णानि यथा विहाय
नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा-
न्यन्यानि संयाति नवानि देही॥" (गीता 2.22)अर्थ: जैसे मनुष्य पुराने वस्त्र त्यागकर नए वस्त्र धारण करता है, वैसे ही आत्मा पुराने शरीर को छोड़कर नया शरीर धारण करती है।
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"नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि
नैनं दहति पावकः।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो
न शोषयति मारुतः॥" (गीता 2.23)अर्थ: आत्मा को न तो शस्त्र काट सकते हैं, न आग जला सकती है, न जल भिगो सकता है, और न ही वायु इसे सुखा सकती है।
निष्कर्ष:
श्रीकृष्ण ने गीता में आत्मा को अविनाशी, अजर-अमर, नित्य और अद्वितीय बताया है। शरीर नष्ट होता है, लेकिन आत्मा सदा रहती है और पुनर्जन्म लेती है।
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