"हरीराम की भक्ति और श्रीकृष्ण की कृपा"


https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-9937615590363233"भगवान कृष्ण की कृपा: हरीराम की सच्ची कहानी"

बनारस की तंग गलियों में एक साधारण किंतु परम कृष्ण-भक्त, हरीराम, गुलाब की पंखुड़ियों से गुलकंद बनाने का काम करता था। उसकी बनाई हुई गुलकंद दूर-दूर तक मशहूर थी। मिठास केवल गुलाब की नहीं थी, बल्कि उसमें प्रेम और भक्ति का रस भी घुला हुआ था। हरीराम दिनभर काम करता, लेकिन उसकी असली दुनिया तो रात में शुरू होती थी— जब वह अपने ठाकुर जी (भगवान श्रीकृष्ण) के सामने बैठकर भजन गाता, उनसे बातें करता और उन्हें प्रेम से निहारता।

भगवान के लिए समर्पित भक्ति

हरीराम की दिनचर्या में एक नियम था— वह अपनी बनी हुई गुलकंद का पहला हिस्सा ठाकुर जी को अर्पित करता, फिर ही उसे बेचने के लिए बाजार में ले जाता। वह मानता था कि उसकी गुलकंद की मिठास और सफलता का रहस्य केवल कृष्ण की कृपा थी।

लेकिन समय ने करवट बदली। एक दिन अचानक व्यापार में मंदी आ गई। उसकी गुलकंद बिकनी बंद हो गई। कुछ लोगों ने नई गुलकंद बनानी शुरू कर दी, जिससे हरीराम का काम ठप पड़ने लगा। अब उसके लिए रोज़ी-रोटी जुटाना भी कठिन हो गया।

https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-9937615590363233कठिन परीक्षा का समय

स्थिति इतनी खराब हो गई कि हरीराम के पास ठाकुर जी के लिए भोग लगाने को कुछ भी नहीं बचा। भूखा रहना तो स्वीकार था, लेकिन बिना भोग लगाए भोजन करना उसके लिए असंभव था।

एक रात, हरीराम ठाकुर जी के सामने बैठकर रोने लगा—
"प्रभु! जब तक आपकी कृपा थी, मेरा जीवन ठीक था। लेकिन अब मैं आपको भोग भी नहीं चढ़ा सकता। क्या मेरी भक्ति में कोई कमी रह गई?"

थककर वह वहीं सो गया।

भगवान की अद्भुत लीला

अगले दिन सुबह दरवाजे पर दस्तक हुई। हरीराम ने दरवाजा खोला, तो देखा कि एक सुंदर किशोर, पीले वस्त्र पहने, सिर पर मोर मुकुट सजाए खड़ा था। उसके हाथ में एक बड़ी पोटली थी।

किशोर ने मुस्कुराते हुए कहा—
"हरीराम काका, यह गुलाब की पंखुड़ियाँ और कुछ मीठा सामान तुम्हारे लिए भेजा गया है। इससे गुलकंद बना लो।"

हरीराम ने आश्चर्य से पूछा— "लेकिन किसने भेजा?"

किशोर ने हल्की हँसी के साथ उत्तर दिया— "जिसके लिए तुम रोज़ गुलकंद बनाते हो, उसी ने।"

हरीराम की आँखों से आँसू छलक पड़े। जब उसने पोटली खोली, तो उसमें उच्च गुणवत्ता की गुलाब की पंखुड़ियाँ और शुद्ध मिश्री थी।

https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-9937615590363233चमत्कार और विश्वास

हरीराम ने उसी दिन गुलकंद बनाई और बाजार में लेकर गया। जैसे ही उसने दुकान लगाई, एक अमीर सेठ आया और पूरी गुलकंद खरीद ली। इसके बाद हरीराम का व्यापार फिर से बढ़ने लगा।

अब उसे समझ आ चुका था कि वह कोई साधारण किशोर नहीं, बल्कि स्वयं श्रीकृष्ण थे, जो अपने भक्त की परीक्षा लेने और उसकी रक्षा करने आए थे।

भक्ति का संदेश

यह कथा हमें सिखाती है कि जो सच्चे मन से भगवान की भक्ति करता है, उसका योगक्षेम स्वयं श्रीकृष्ण वहन करते हैं।https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-9937615590363233 कठिन समय चाहे जितना भी हो, लेकिन अगर श्रद्धा अटूट हो, तो भगवान स्वयं अपने भक्तों की मदद के लिए प्रकट होते हैं।

"राधे राधे! जय श्रीकृष्ण!"

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