श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जो उपदेश दिया, उसमें पुण्य और पाप का स्पष्ट वर्णन किया है। गीता के अनुसार:
पुण्य क्या है?
धर्मपूर्वक अपने कर्तव्यों का पालन करना (स्वधर्म का आचरण) – (गीता 3.35)
निष्काम भाव से कर्म करना, फल की चिंता न करना – (गीता 2.47)
सत्य, अहिंसा, दया, करुणा, प्रेम और परोपकार जैसे सद्गुणों का पालन करना
भगवद्भक्ति करना और सत्य मार्ग पर चलना
अपने स्वभाव के अनुसार समाज और लोक-कल्याण के लिए कर्म करना
पाप क्या है?
अधर्म का आचरण करना और स्वार्थपूर्ण कार्यों में लिप्त रहना
अपने कर्तव्यों से विमुख होना – (गीता 2.33)
काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार और द्वेष में फँसना – (गीता 16.21)
हिंसा, छल, कपट, असत्य, चोरी, निंदा, और अन्याय करना
दूसरों के अधिकारों का हनन करना और अहंकारवश किसी को कष्ट देना
भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है कि जो भी व्यक्ति निष्काम भाव से, समर्पण और श्रद्धा के साथ अपना कर्तव्य निभाता है, वही पुण्य प्राप्त करता है। वहीं, जो व्यक्ति अधर्म और स्वार्थ की राह पर चलता है, वह पाप का भागी बनता है।
"कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।"
(अर्थात्— तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, फल में नहीं) – (गीता 2.47)
इसलिए, गीता के अनुसार पुण्य और पाप का आधार व्यक्ति का कर्म और उसकी नीयत होती है।
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