गांव के बाहर एक पुराना बरगद का पेड़ था। लोगों का मानना था कि वहां एक सिद्ध साधु का वास था, जो केवल उन्हीं को दर्शन देते थे जो सच्चे मन से उनकी भक्ति करते थे।
एक दिन, एक गरीब किसान रामू वहां गया। उसकी फसल लगातार तीन सालों से खराब हो रही थी, और अब उसके पास घर चलाने के लिए कुछ भी नहीं बचा था। वह बरगद के नीचे बैठकर फूट-फूटकर रोने लगा।
तभी एक बूढ़े साधु वहां प्रकट हुए और बोले, "वत्स, मैं तुम्हारी भक्ति से प्रसन्न हूँ। मैं तुम्हें एक वरदान देना चाहता हूँ। मांगो, क्या चाहते हो?"
रामू ने जल्दी से कहा, "बाबा, मेरी फसल कभी खराब न हो। मैं हमेशा अमीर बना रहूं।"
साधु मुस्कुराए और बोले, "ठीक है, लेकिन एक शर्त है—तुम जो भी पाओगे, उसका आधा गाँव के जरूरतमंदों को देना होगा।"
रामू ने झट से हामी भर दी। अगले ही दिन से उसके खेतों में सोने जैसी फसल उगने लगी। उसकी गरीबी खत्म हो गई, लेकिन उसने शर्त को भूलकर सब कुछ अपने पास ही रखना शुरू कर दिया।
कुछ ही महीनों में अजीब घटनाएँ होने लगीं। रामू के खेतों में कीड़े पड़ने लगे, घर की दीवारों में दरारें आने लगीं, और उसके जानवर बीमार पड़ने लगे। डर के मारे वह फिर से बरगद के पेड़ के पास गया और बाबा को पुकारा।
बाबा प्रकट हुए और बोले, "वत्स, तुमने अपनी शर्त तोड़ी। लालच में पड़कर तुमने जरूरतमंदों को भूल दिया। अब तुम्हें अपने कर्मों का फल भुगतना होगा।"
https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-9937615590363233रामू को अपनी गलती का अहसास हुआ। उसने तुरंत अपनी आधी संपत्ति गाँव के गरीबों में बांट दी। धीरे-धीरे उसकी परेशानियाँ दूर होने लगीं, और उसकी फसल फिर से लहलहाने लगी।
उस दिन से रामू ने समझ लिया कि सच्ची दौलत सिर्फ धन नहीं, बल्कि दान और सद्भावना भी होती है।
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