किसी समय की बात है। रामपुर नाम के गाँव में गोपाल नाम का एक गरीब लेकिन ईमानदार व्यक्ति रहता था। वह गाँव में लकड़ी काटकर बेचता और अपने परिवार का पालन-पोषण करता था। उसकी ईमानदारी के किस्से पूरे गाँव में मशहूर थे।
एक दिन, वह जंगल में पेड़ काट रहा था कि अचानक उसकी कुल्हाड़ी हाथ से फिसलकर नदी में गिर गई। नदी बहुत गहरी थी, और गोपाल के पास दूसरी कुल्हाड़ी खरीदने के लिए पैसे भी नहीं थे। वह परेशान होकर नदी के किनारे बैठ गया।
तभी अचानक नदी से एक देवता प्रकट हुए। उन्होंने गोपाल से पूछा, "तुम क्यों उदास हो, वत्स?"
गोपाल ने सिर झुकाकर कहा, "मेरी कुल्हाड़ी नदी में गिर गई है। वह मेरी रोज़ी-रोटी का एकमात्र साधन थी।"
देवता मुस्कुराए और नदी में डुबकी लगाई। जब वे ऊपर आए, तो उनके हाथ में एक सोने की कुल्हाड़ी थी। उन्होंने पूछा, "क्या यह तुम्हारी कुल्हाड़ी है?"
गोपाल ने कुल्हाड़ी को देखा और ईमानदारी से कहा, "नहीं, देवता जी, मेरी कुल्हाड़ी लोहे की थी।"
देवता ने फिर से गोता लगाया और इस बार एक चाँदी की कुल्हाड़ी निकाली। "क्या यह तुम्हारी कुल्हाड़ी है?"
गोपाल ने फिर से सिर हिलाया और कहा, "नहीं, मेरी कुल्हाड़ी तो लोहे की थी।"
तीसरी बार, देवता ने लोहे की कुल्हाड़ी निकाली। इसे देखते ही गोपाल खुश हो गया और बोला, "हाँ, यही मेरी कुल्हाड़ी है!"
देवता उसकी ईमानदारी से प्रसन्न हुए और बोले, "तुम्हारी ईमानदारी के इनाम में मैं तुम्हें तीनों कुल्हाड़ियाँ देता हूँ।"
गोपाल ने खुशी-खुशी तीनों कुल्हाड़ियाँ ले लीं और घर लौट आया। उसकी ईमानदारी की चर्चा पूरे गाँव में होने लगी, और वह हमेशा सुखी जीवन व्यतीत करता रहा।
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