kahani hindi story-राजा का अनोखा न्याय


प्राचीन समय की बात है। मगध राज्य में सम्राट विक्रम नामक एक न्यायप्रिय राजा राज करते थे। उनके दरबार में न्याय को सर्वोच्च स्थान दिया जाता था। एक दिन, उनके दरबार में दो व्यापारी पहुंचे। दोनों एक ही थैली पर अपना दावा कर रहे थे, जिसमें सोने की मुद्राएँ भरी थीं।

राजा विक्रम ने दोनों को ध्यान से सुना। पहला व्यापारी बोला, "महाराज! यह थैली मेरी है। मैंने इसे बाजार में गिरा दिया था, और जब लौटा तो इसे इस व्यक्ति के हाथ में पाया।"

दूसरा व्यापारी बोला, "नहीं राजन, यह थैली मेरी है। मैं इसे अपने घर ले जा रहा था, लेकिन गलती से गिर गई। जब मैं वापस आया, तो इस व्यक्ति ने इसे उठाया हुआ था।"

राजा विक्रम ने मुस्कुराते हुए सैनिकों को आदेश दिया कि वे थैली लाएं। जब थैली दरबार में लाई गई, तो राजा ने उसे खोलकर देखा। उन्होंने दोनों व्यापारियों की ओर देखा और बोले, "इस थैली का मालिक कौन है, यह तय करने के लिए मैं एक परीक्षा लूंगा।"

राजा ने थैली से कुछ सोने की मुद्राएँ निकालकर अपने हाथ में लीं और बोले, "जिसका यह थैली है, वह बता सकता है कि इसमें कुल कितनी मुद्राएँ हैं?"

पहला व्यापारी हड़बड़ा गया और अनुमान लगाने लगा, "लगभग 50... नहीं 60... शायद 55 होगी।"

दूसरा व्यापारी तुरंत बोला, "महाराज, इसमें 57 मुद्राएँ हैं, और इसके अंदर एक चांदी की अंगूठी भी है, जो मेरी पत्नी की निशानी है।"

राजा विक्रम मुस्कुराए और सैनिकों को आदेश दिया कि वे थैली की पूरी जाँच करें। जब सैनिकों ने मुद्राएँ गिनीं, तो सच में उनमें 57 थीं और एक चांदी की अंगूठी भी थी!

राजा ने आदेश दिया, "इस थैली का असली मालिक यही व्यक्ति है। ईमानदारी और सच्चाई से कोई चीज़ नहीं छुपाई जा सकती। न्याय का असली आधार सत्य है।"

पहला व्यापारी सिर झुका कर खड़ा रहा, और सच्चे व्यापारी ने राजा को धन्यवाद दिया।

इस प्रकार, राजा विक्रम की बुद्धिमत्ता से सत्य की विजय हुई और न्याय की प्रतिष्ठा बनी रही।

शिक्षा: सत्य की पहचान करने के लिए बुद्धि और धैर्य की आवश्यकता होती है। झूठ कितना भी मजबूत लगे, अंत में सत्य की ही जीत होती है।

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