समुद्र मंथन और नीलकंठ कथा


बहुत प्राचीन समय की बात है, जब देवताओं और असुरों के बीच अमृत प्राप्त करने के लिए समुद्र मंथन हुआ। यह मंथन मंदार पर्वत को मथनी और वासुकी नाग को रस्सी बनाकर किया गया। देवता और असुर, दोनों मिलकर इसे चला रहे थे।

समुद्र मंथन से कई दिव्य वस्तुएँ प्राप्त हुईं, जिनमें कामधेनु, पारिजात वृक्ष, ऐरावत हाथी, उच्चैःश्रवा घोड़ा, अप्सराएँ और धन्वंतरि के हाथों अमृत कलश निकला। लेकिन अमृत निकलने से पहले समुद्र से हलाहल नामक अत्यंत घातक विष भी निकला।

https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-9937615590363233विष के प्रभाव से सृष्टि संकट में

हलाहल विष इतना प्रचंड था कि उसकी ज्वाला से देवता, असुर और समस्त प्राणी जलने लगे। इसका प्रभाव पूरे ब्रह्मांड पर पड़ने लगा और सभी लोक संकट में आ गए। देवता घबरा गए और त्राहि-त्राहि करते हुए भगवान विष्णु के पास गए। भगवान विष्णु ने कहा कि इस संकट से सिर्फ महादेव ही रक्षा कर सकते हैं।

तब सभी देवता कैलाश पर्वत पहुँचे और भगवान शिव से प्रार्थना की, “हे महादेव! संपूर्ण सृष्टि संकट में है। यह विष इतना घातक है कि यदि इसे तुरंत नष्ट नहीं किया गया तो पूरी दुनिया विनाश हो जाएगी। कृपया हमारी रक्षा करें।”

https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-9937615590363233महादेव ने विषपान किया

भगवान शिव करुणा के सागर थे। उन्होंने समस्त प्राणियों की रक्षा के लिए उस विष को स्वयं पीने का निश्चय किया। उन्होंने हलाहल विष को अपने हाथों में लिया और बिना किसी भय के उसे अपने कंठ में धारण कर लिया। परंतु माता पार्वती ने शिव जी का गला दबा दिया, ताकि विष उनके शरीर में न उतरे। इस कारण विष उनके कंठ में ही रह गया, जिससे उनका गला नीला पड़ गया।

इसी कारण भगवान शिव को "नीलकंठ" कहा जाने लगा। विष के प्रभाव से उनके शरीर में अत्यधिक उष्णता बढ़ने लगी, जिससे सभी देवताओं ने उन्हें शीतलता प्रदान करने के लिए जल अर्पित किया। इसी परंपरा के रूप में भक्त आज भी शिवलिंग पर जल चढ़ाते हैं।

https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-9937615590363233सृष्टि की रक्षा और महादेव की महिमा

भगवान शिव के इस महान त्याग से सृष्टि की रक्षा हुई और समुद्र मंथन आगे बढ़ सका। अंततः देवताओं को अमृत प्राप्त हुआ, जिससे वे पुनः बलशाली हुए और असुरों पर विजय प्राप्त की।


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