https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-9937615590363233हिरण्यकशिपु नामक राक्षस को वरदान प्राप्त था कि वह न तो दिन में मरेगा, न रात में, न घर के अंदर, न बाहर, न किसी मनुष्य से, न किसी पशु से, न अस्त्र से, न शस्त्र से। इस वरदान के कारण वह अत्यंत अहंकारी हो गया और स्वयं को ईश्वर मानने लगा।
उसका पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का परम भक्त था, जिससे हिरण्यकशिपु क्रोधित रहता था। उसने कई बार प्रह्लाद को मारने का प्रयास किया, लेकिन हर बार भगवान विष्णु ने उसकी रक्षा की।
https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-9937615590363233अंततः, जब हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद से पूछा, "तेरा भगवान कहाँ है?" तो प्रह्लाद ने उत्तर दिया, "वह हर जगह है!" क्रोधित होकर, हिरण्यकशिपु ने एक खंभे को तोड़ा, और तभी भगवान विष्णु नरसिंह अवतार में प्रकट हुए। उन्होंने संध्या के समय (न दिन, न रात), दरवाजे की देहली पर (न घर के अंदर, न बाहर), अपने नाखूनों (न अस्त्र, न शस्त्र) से हिरण्यकशिपु का वध किया।
सीख: भगवान अपने भक्तों की रक्षा करने के लिए किसी भी सीमा तक जा सकते हैं।
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