प्राचीन काल में भस्मासुर नाम का एक असुर था, जो अत्यंत कठोर तपस्या कर भगवान शिव को प्रसन्न करना चाहता था। उसने वर्षों तक तपस्या की, जिससे भोलेनाथ प्रसन्न हुए और प्रकट होकर बोले, "वत्स, तुम्हारी तपस्या से मैं प्रसन्न हूँ, वरदान मांगो!"
भस्मासुर का धूर्त वरदान
भस्मासुर ने चालाकी से कहा, "हे महादेव, मुझे ऐसा वरदान दीजिए कि मैं जिसके सिर पर हाथ रखूं, वह तुरंत भस्म हो जाए!"
भोलेनाथ सरल हृदय थे, उन्होंने बिना कोई छल-कपट सोचे भस्मासुर को यह वरदान दे दिया। लेकिन वरदान मिलते ही भस्मासुर अहंकारी हो गया और अपनी शक्ति को परखने के लिए स्वयं भगवान शिव के सिर पर हाथ रखने दौड़ पड़ा!
भगवान विष्णु की चतुराई
शिवजी को भस्मासुर की धूर्तता समझ में आई, लेकिन वरदान वापस नहीं लिया जा सकता था। वे तुरंत वहां से भागे और गुफाओं, जंगलों, पर्वतों में भटकने लगे। जब भस्मासुर लगातार उनका पीछा करने लगा, तो शिवजी ने भगवान विष्णु से सहायता मांगी।
भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण किया—एक अत्यंत सुंदर अप्सरा के रूप में भस्मासुर के सामने प्रकट हुए। मोहिनी को देखकर भस्मासुर मोहित हो गया और उसकी बातों में आ गया।
मोहिनी ने कहा, "यदि तुम सच में शक्तिशाली हो, तो पहले मेरे साथ नृत्य करके दिखाओ!" भस्मासुर नृत्य करने लगा और मोहिनी की हर मुद्रा को दोहराने लगा।
मोहिनी ने नृत्य करते-करते धीरे-धीरे अपने सिर पर हाथ रखा। भस्मासुर ने भी अज्ञानतावश वही किया और जैसे ही उसका हाथ उसके सिर पर पड़ा, वह स्वयं ही भस्म हो गया!
कथा से सीख:
यह कथा हमें सिखाती है कि अत्यधिक अहंकार और शक्ति का दुरुपयोग अंततः व्यक्ति के विनाश का कारण बनता है। भगवान शिव भोलेनाथ हैं, लेकिन उनकी भक्ति में सच्चाई होनी चाहिए, न कि कपट।
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