एक गाँव में एक गरीब लकड़हारा रहता था। वह बहुत ईमानदार और मेहनती था। हर दिन वह जंगल में जाकर पेड़ों को काटता और लकड़ियाँ बेचकर अपनी रोज़ी-रोटी कमाता।
एक दिन लकड़हारा नदी के किनारे एक पेड़ काट रहा था। अचानक उसकी कुल्हाड़ी हाथ से फिसल गई और नदी में गिर गई। लकड़हारा बहुत परेशान हो गया क्योंकि वही कुल्हाड़ी उसकी आजीविका का एकमात्र साधन थी।
वह नदी के किनारे बैठकर रोने लगा। उसकी सच्चाई और मेहनत से खुश होकर नदी से एक जलपरी प्रकट हुई। उसने लकड़हारे से पूछा, "तुम क्यों रो रहे हो?"
लकड़हारे ने अपनी समस्या बताई। जलपरी ने कहा, "चिंता मत करो। मैं तुम्हारी कुल्हाड़ी ढूंढकर लाती हूँ।"
जलपरी नदी में डूबी और सोने की एक कुल्हाड़ी लेकर आई। उसने लकड़हारे से पूछा, "क्या यह तुम्हारी कुल्हाड़ी है?"
लकड़हारे ने ईमानदारी से कहा, "नहीं, यह मेरी कुल्हाड़ी नहीं है।"
फिर जलपरी चांदी की कुल्हाड़ी लेकर आई और पूछा, "क्या यह तुम्हारी कुल्हाड़ी है?"
लकड़हारे ने फिर से कहा, "नहीं, यह मेरी कुल्हाड़ी नहीं है।"
अंत में जलपरी ने लोहे की कुल्हाड़ी निकाली और पूछा, "क्या यह तुम्हारी कुल्हाड़ी है?"
लकड़हारे ने खुश होकर कहा, "हाँ, यह मेरी कुल्हाड़ी है!"
जलपरी उसकी ईमानदारी से प्रभावित हुई और उसे तीनों कुल्हाड़ियाँ दे दीं। लकड़हारा खुशी-खुशी अपने गाँव लौट आया।
शिक्षा:
ईमानदारी का फल हमेशा मीठा होता है।
<script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-9937615590363233"
crossorigin="anonymous"></script>

0 Comments