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बहुत समय पहले की बात है। एक राज्य में हरिशंकर नाम का राजा राज करता था। राजा बहुत बुद्धिमान और दयालु था। उसकी प्रजा उसे बहुत प्यार करती थी। राजा के तीन बेटे थे - अर्जुन, विक्रम, और समर। राजा की ख्वाहिश थी कि उसके बेटे अच्छे राजा बनें और प्रजा की सेवा करें। लेकिन तीनों में से कोई भी राजकाज में रुचि नहीं दिखाता था।
राजा को यह बात बहुत परेशान करती थी। एक दिन, उसे अपने राजगुरु से सलाह मिली। राजगुरु ने कहा, "महाराज, आपके बेटों को जिम्मेदारी और सच्ची समझ का महत्व सिखाने के लिए उन्हें एक परीक्षा देनी होगी।"
तोता और राजा की योजना
राजगुरु ने सुझाव दिया कि तीनों राजकुमारों को एक-एक तोता दिया जाए। राजा ने एक सुंदर तोते को बुलाया और तीनों को बुलाकर कहा, "यह तोते तुम्हारी जिम्मेदारी हैं। एक महीने बाद मैं देखूंगा कि किसने अपने तोते की सबसे अच्छी देखभाल की है। जो भी अपने तोते को सबसे अच्छा संभालेगा, वही अगला राजा बनने का हकदार होगा।"
तीन भाइयों की कोशिश
अर्जुन: अर्जुन ने तोते को एक सुंदर सोने के पिंजरे में रखा। उसने तोते को सबसे महंगे फल और दाने खिलाए, लेकिन कभी उससे बात नहीं की। तोता पिंजरे में बंद होकर उदास रहने लगा।
विक्रम: विक्रम ने तोते को खुले में छोड़ दिया और उसकी ओर ध्यान नहीं दिया। तोता भोजन और प्यार की कमी के कारण कमजोर हो गया।
समर: समर ने तोते को खुले में उड़ने दिया। वह हर दिन तोते के साथ समय बिताता, उसे प्यार से दाने खिलाता और उसकी भाषा समझने की कोशिश करता। तोता समर का दोस्त बन गया और हमेशा उसके पास लौट आता।
परीक्षा का दिन
एक महीने बाद राजा ने तीनों से उनके तोते के बारे में पूछा। अर्जुन का तोता कमजोर और उदास था। विक्रम का तोता उड़कर कभी वापस नहीं आया। लेकिन समर का तोता खुश और स्वस्थ था। वह समर के कंधे पर बैठा था और उसकी बातों का जवाब दे रहा था।
राजा ने मुस्कुराते हुए कहा, "समर, तुमने सच्चे राजा की तरह जिम्मेदारी निभाई है। राजा वह होता है जो दूसरों को स्वतंत्रता और खुशहाली देता है, न कि केवल अपने स्वार्थ के लिए काम करता है।"
राजा का संदेश
इस घटना ने तीनों भाइयों को एक महत्वपूर्ण सीख दी। राजा हरिशंकर ने अपने राज्य को समर को सौंप दिया और बाकी दोनों बेटों को प्रजा की सेवा में लगाया। समर ने तोते की तरह अपनी प्रजा को खुश और आज़ाद रखा, और उसका नाम इतिहास में एक महान राजा के रूप में दर्ज हुआ।
इस प्रकार, राजा और तोते की यह कहानी हमें सिखाती है कि सच्ची जिम्मेदारी, दया, और समझदारी ही नेतृत्व का मूल आधार है।
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