गांव के बाहर, एक सुनसान इलाके में एक पुराना और विशाल बंगला खड़ा था। इसे लोग "भूलभुलैया बंगला" कहते थे। कहा जाता था कि वहां जो भी गया, वो वापस नहीं लौटा। रात के अंधेरे में उस बंगले से अजीब-अजीब आवाजें आती थीं।
गांव के किशोर, अमित, को रहस्य जानने का बड़ा शौक था। उसने ठान लिया कि वह इस बंगले के पीछे की सच्चाई जानकर रहेगा। एक दिन, चांदनी रात में, उसने अपने दोस्त विशाल के साथ बंगले में जाने का फैसला किया।
दोनों दोस्त एक टॉर्च और एक रस्सी लेकर रात के समय बंगले की ओर निकल पड़े। जैसे ही वे बंगले के करीब पहुंचे, उन्हें ठंडी हवा का झोंका महसूस हुआ और एक अजीब-सी सिहरन उनके शरीर में दौड़ गई।
बंगले का मुख्य दरवाजा टूटा हुआ था। दोनों अंदर घुसे और देखा कि हर जगह धूल और मकड़ी के जाले थे। धीरे-धीरे वे एक बड़े कमरे में पहुंचे। वहां एक पुरानी अलमारी रखी हुई थी। अलमारी के पास पहुंचते ही अमित ने महसूस किया कि किसी ने उसकी पीठ पर हल्का हाथ रखा। वह डर के मारे पीछे मुड़ा, लेकिन वहां कोई नहीं था।
अचानक, अलमारी का दरवाजा अपने-आप खुल गया। अंदर एक पुरानी डायरी रखी थी। अमित ने डायरी उठाई और पढ़ने लगा। उसमें लिखा था:
"यह बंगला मेरी आत्मा का कैदखाना है। मुझे मुक्त करो, वरना यहां आने वाला हर इंसान इसी तरह फंसा रहेगा।"
इतना पढ़ते ही कमरे में एक जोरदार आवाज हुई और बंगले की सारी खिड़कियां अपने-आप खुल गईं। विशाल ने घबराकर अमित से कहा, "हमें यहां से तुरंत निकलना चाहिए!"
दोनों ने दौड़ लगाई, लेकिन दरवाजा अचानक बंद हो गया। तभी एक बूढ़ी औरत की छवि उनके सामने आई। वह बोली, "डरो मत, मैं तुम्हें नुकसान नहीं पहुंचाऊंगी। मेरी आत्मा इस बंगले में वर्षों से फंसी है। यह डायरी मेरे दर्द की कहानी है। अगर तुम मेरी अस्थियां पास के जंगल में जाकर नदी में प्रवाहित कर दोगे, तो मैं मुक्त हो जाऊंगी।"
अमित और विशाल ने हिम्मत जुटाई और अगले दिन उस बूढ़ी औरत की बताई हुई जगह से उसकी अस्थियां ढूंढ़ निकालीं। उन्हें नदी में प्रवाहित करते ही, बंगले का सारा रहस्य खत्म हो गया। वह बूढ़ी औरत एक मुस्कान के साथ गायब हो गई।
इसके बाद वह बंगला सामान्य हो गया और गांववालों का डर भी खत्म हो गया।
सीख: कभी-कभी रहस्यों के पीछे छुपा सच सिर्फ एक अधूरी कहानी का अंत होता है।
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