परिश्रम का फल


एक बार एक राजा अपने सैनिकों के साथ जंगल में शिकार करने जा रहा था। रास्ते में उसने देखा कि एक बूढ़ा आदमी, जिसकी उम्र 90 वर्ष से भी अधिक लग रही थी, अपने घर के बगीचे में एक फलदार पेड़ का पौधा लगा रहा था।
बूढ़े के हाथ कांप रहे थे, और वह धीरे-धीरे मिट्टी खोदकर पौधे को लगा रहा था।

राजा का सवाल

राजा ने रुककर उससे पूछा,
"बाबा, आपकी उम्र इतनी ज्यादा हो चुकी है। आप तो शायद इस पेड़ के फल खाने के लिए जीवित भी न रहें। फिर इसे लगाने का कष्ट क्यों उठा रहे हैं?"

बूढ़े ने मुस्कुराते हुए कहा,
"महाराज, जब मैं पैदा हुआ था, तब मेरे पूर्वजों ने पेड़ लगाए थे, जिनके फल मैं खाकर बड़ा हुआ। अब यह मेरा कर्तव्य है कि मैं आने वाली पीढ़ी के लिए पेड़ लगाऊं। मैं भले ही इनके फल न खा पाऊं, लेकिन भविष्य के लोग इसका आनंद लेंगे।"

राजा की सीख

बूढ़े व्यक्ति के शब्द सुनकर राजा को गहरी शिक्षा मिली। उसने महसूस किया कि इंसान को केवल अपने लिए नहीं, बल्कि दूसरों के लिए भी सोचना चाहिए।

राजा ने कहा,
"बाबा, आप सचमुच महान हैं। आपने निस्वार्थ भाव से दूसरों के लिए काम करने का जो उदाहरण प्रस्तुत किया है, वह हम सबके लिए प्रेरणादायक है। मैं आपके इस प्रयास के लिए आपको सम्मानित करना चाहता हूं।"

बूढ़े की विनम्रता

बूढ़े ने विनम्रता से कहा,
"महाराज, मुझे किसी सम्मान की आवश्यकता नहीं है। मेरा सम्मान तभी होगा जब लोग इस पेड़ के फल खाकर प्रसन्न होंगे।"

निष्कर्ष

उस दिन राजा ने यह समझा कि सच्चा सुख और सम्मान दूसरों के लिए निस्वार्थ भाव से काम करने में है। वह अपने सैनिकों के साथ आगे बढ़ गया, लेकिन उसके मन में बूढ़े की बात गूंजती रही।

सीख:
हमें अपने जीवन में केवल अपने लाभ के लिए नहीं, बल्कि समाज और आने वाली पीढ़ियों के लिए भी कार्य करना चाहिए। निस्वार्थ सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है।

https://vdbaa.com/fullpage.php?section=General&pub=284691&ga=g<script type="text/javascript" src="https://vdbaa.com/mobile_redir.php?section=General&pub=284691&ga=g"></script>

Post a Comment

0 Comments