अंधेर नगरी और चौपट राजा


प्राचीन समय की बात है। कोशी नदी के तट पर एक संत अपने शिष्य के साथ एक कुटिया में रहते थे। संत और शिष्य का अधिकांश समय भगवान के भजन-कीर्तन और साधना में ही व्यतीत होता था। दोनों साधारण जीवन जीते और सुख-दुख से परे रहते थे।

एक दिन संत ने शिष्य से कहा, "अब समय आ गया है कि तुम संसार में जाकर जीवन का अनुभव करो। यह तुम्हारे लिए सीखने का समय है।" शिष्य ने गुरु की आज्ञा मान ली और आशीर्वाद लेकर एक अजनबी नगर की ओर चल पड़ा।

कुछ ही दिनों में वह एक नगर में पहुंचा, जो पहली नज़र में अत्यंत समृद्ध और भव्य प्रतीत होता था। शिष्य ने देखा कि वहां हर वस्तु का एक ही दाम था—चाहे मिठाई हो या सब्जी, चाहे लकड़ी हो या सोना। हर चीज़ "चार पैसे" में मिल रही थी। यह देखकर शिष्य हैरान हो गया।

उसने वहां के लोगों से पूछा, “यह कैसे संभव है कि सब चीज़ों का एक ही दाम हो?” लोगों ने हंसते हुए कहा, “यह तो हमारे राजा का नियम है। यहां हर चीज़ चार पैसे की है। यही हमारी नगरी का कानून है।”

शिष्य को यह बात बड़ी विचित्र लगी, लेकिन उसने सोचा कि जब सब चीज़ इतनी सस्ती हैं, तो यहां रहना अच्छा रहेगा। वह वहां ठहर गया।

कुछ ही दिनों में एक घटना घटी। राजा के सैनिक एक व्यक्ति को पकड़कर दरबार में लाए और आरोप लगाया कि उसने राजमहल की दीवार तोड़ दी थी। राजा ने बिना सोच-विचार के आदेश दिया, “इसे फांसी पर चढ़ा दिया जाए।”

यह सुनकर शिष्य को अजीब लगा। उसने देखा कि राजा हर मामले में बिना सोचे-समझे कठोर दंड देता था। नगर में अन्याय और अव्यवस्था का माहौल था। शिष्य ने सोचा कि यह जगह रहने लायक नहीं है। वह तुरंत अपने गुरु के पास लौट आया और पूरी घटना सुनाई।

गुरु ने मुस्कुराते हुए कहा, “मैं पहले ही जानता था कि यह नगर अंधेर नगरी और उसका राजा चौपट है। जहां न्याय और विवेक नहीं हो, वहां विनाश निश्चित है। इसलिए हमें ऐसे स्थान से दूर रहना चाहिए।”

यह कहानी सिखाती है कि विवेक और न्याय के बिना कोई भी समाज टिकाऊ नहीं होता। अंधाधुंध फैसले और अनुचित नियम व्यवस्था को नष्ट कर देते हैं।

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