रात का यात्री

"रात का यात्री" यह कहानी एक छोटे गाँव के पास बने सुनसान जंगल की है। उस जंगल के बारे में कहा जाता था कि वहाँ रात में कोई नहीं जाता। जो भी गया, वह वापस नहीं लौटा। रमेश, एक निडर युवक, इन बातों पर बिल्कुल यकीन नहीं करता था। एक रात उसने अपने दोस्तों के सामने घोषणा कर दी, "मैं आज रात जंगल जाऊँगा और साबित कर दूँगा कि यह सब बकवास है।" उसके दोस्तों ने उसे मना किया, लेकिन रमेश ने उनकी एक न सुनी। रात के ठीक 12 बजे, रमेश ने एक टॉर्च उठाई और जंगल की ओर चल पड़ा। चाँद की रोशनी हल्की थी, और चारों ओर अजीब सन्नाटा फैला हुआ था। जैसे ही वह जंगल के अंदर पहुँचा, उसे लगा कि पेड़ उसके ऊपर झुकने लगे हैं। अचानक, उसने महसूस किया कि कोई उसके पीछे चल रहा है। उसने टॉर्च की रोशनी पीछे फेंकी, लेकिन वहाँ कोई नहीं था। उसने सोचा, शायद यह उसका भ्रम है। थोड़ा और आगे बढ़ने पर उसने एक आदमी को देखा, जो काले कपड़े पहने, एक पेड़ के नीचे बैठा था। रमेश ने हिम्मत जुटाकर पूछा, "तुम यहाँ इस वक्त क्या कर रहे हो?" आदमी ने धीरे से जवाब दिया, "मैं यहाँ राह देख रहा हूँ।" "किसकी राह?" रमेश ने पूछा। आदमी ने मुस्कुराते हुए कहा, "तुम्हारी।" यह सुनते ही रमेश के रोंगटे खड़े हो गए। उसने टॉर्च की रोशनी उस आदमी के चेहरे पर डाली, लेकिन वहाँ कोई चेहरा नहीं था, बस एक खाली अंधेरा! डर के मारे रमेश दौड़ने लगा। वह जितना तेज़ दौड़ता, वह महसूस करता कि वह आदमी उसके और करीब आ रहा है। अचानक, रमेश ठोकर खाकर गिर पड़ा। जब उसने उठने की कोशिश की, तो उसने देखा कि वह आदमी उसके सामने खड़ा है। उस आदमी ने कहा, "तुमने हिम्मत तो दिखाई, लेकिन कुछ राज़ इंसानों से छुपे ही रहने चाहिए।" सुबह, गाँव वालों ने रमेश को जंगल के किनारे बेहोश पाया। जब वह होश में आया, तो उसने कुछ भी बोलने से इनकार कर दिया। उसने उस दिन के बाद कभी जंगल का नाम नहीं लिया, और गाँव वालों को भी सलाह दी कि वे रात में जंगल के पास न जाएँ। पर आज भी सवाल है: आखिर वह आदमी कौन था? और वह रमेश की "राह" क्यों देख रहा था?
<script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-9937615590363233"
     crossorigin="anonymous"></script>

Post a Comment

0 Comments