मनुष्य दूसरों को सुधारने के लिये उनके दोष देखता है और आलोचना करता है, परिणाम यह होता है कि दूसरों के दोषों का सुधार तो होता नहीं, दोषों का लगातार चिन्तन करने से वे दोष संस्काररूप से उसके अपने अन्दर घर कर लेते हैं, इससे पहले के रहे दोषों की पुष्टि होती है, उन्हें बल मिल जाता है। फिर अपने दोषों का दीखना बन्द हो जाता है, बल्कि कहीं-कहीं तो उनमें गौरवबुद्धि हो जाती है। जिससे पतन का पथ प्रशस्त हो जाता है। चरण सेवा
जब मनुष्य दूसरे को सुधारने के लिये उसके दोष देखता है, तब स्वाभाविक ही वह मानता है कि मुझमें दोष नहीं हैं, गुण हैं। इससे गुणों का अभिमान बढ़ जाता है और दोष बढ़ते रहते हैं। जहाँ अपने दोष देखने की आदत छूटी कि फिर उसका जीवन ही दोषमय बन जाता है।
<script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-9937615590363233"
crossorigin="anonymous"></script>
0 Comments