https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-9937615590363233https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-9937615590363233श्रीमद्भगवद्गीता केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन का गहन दर्शन है। इसमें भगवान श्रीकृष्ण ने मनुष्य के शरीर, आत्मा, प्रकृति और परमात्मा के बीच के संबंध को अत्यंत सरल और वैज्ञानिक ढंग से समझाया है। विशेष रूप से अध्याय 13 (क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग) में प्रकृति (क्षेत्र) और पुरुष (क्षेत्रज्ञ) का विस्तार से वर्णन मिलता है।
यदि हम इन दोनों को सही ढंग से समझ लें, तो जीवन, कर्म, आत्मा और मोक्ष का मार्ग भी स्पष्ट हो जाता है।
प्रकृति क्या है?
गीता के अनुसार प्रकृति वह जड़ शक्ति है जिससे पूरा भौतिक संसार बना है। हमारा शरीर, मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ और संसार की सभी भौतिक वस्तुएँ प्रकृति का ही भाग हैं।
भगवान श्रीकृष्ण इसे "क्षेत्र" कहते हैं, अर्थात वह क्षेत्र जिसमें कर्म होते हैं।
सरल शब्दों में—
प्रकृति = शरीर + मन + बुद्धि + इन्द्रियाँ + सम्पूर्ण भौतिक जगत।
गीता में प्रकृति (क्षेत्र) के अंतर्गत आने वाले तत्त्व
भगवान श्रीकृष्ण अध्याय 13 में बताते हैं कि क्षेत्र के अंतर्गत निम्न तत्त्व आते हैं—
1. पंचमहाभूत
पृथ्वी
जल
अग्नि
वायु
आकाश
2. अहंकार
"मैं" और "मेरा" का भाव।
3. बुद्धि
निर्णय लेने की शक्ति।
4. अव्यक्त (मूल प्रकृति)
वह सूक्ष्म अवस्था जिससे सम्पूर्ण सृष्टि उत्पन्न होती है।
5. दस इन्द्रियाँ
पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ
आँख
कान
नाक
जीभ
त्वचा
पाँच कर्मेन्द्रियाँ
हाथ
पैर
वाणी
गुदा
उपस्थ
6. मन
जो विचार और संकल्प-विकल्प करता है।
7. पाँच इन्द्रिय-विषय
शब्द
स्पर्श
रूप
रस
गंध
8. इच्छा
9. द्वेष
10. सुख
11. दुःख
12. संघात (शरीर)
13. चेतना
14. धृति (धैर्य)
इन सभी को मिलाकर भगवान श्रीकृष्ण ने क्षेत्र अर्थात प्रकृति कहा है।
पुरुष क्या है?
गीता में पुरुष का अर्थ स्त्री के विपरीत "पुरुष" नहीं है।
यहाँ पुरुष का अर्थ है—चेतन सत्ता अर्थात आत्मा।
जो इस शरीर को जानता है, अनुभव करता है और इसका साक्षी है, वही क्षेत्रज्ञ या पुरुष कहलाता है।
शरीर बदलता रहता है, लेकिन आत्मा कभी नहीं बदलती।
प्रकृति और पुरुष में अंतर
प्रकृति
पुरुष
जड़ है
चेतन है
परिवर्तनशील है
अविनाशी है
शरीर और संसार है
आत्मा है
कर्म का क्षेत्र
कर्म का साक्षी
नश्वर
अमर
भगवान श्रीकृष्ण का संदेश
भगवान कहते हैं कि जो व्यक्ति प्रकृति और पुरुष के वास्तविक स्वरूप को समझ लेता है, वह जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त कर सकता है।
जब मनुष्य यह जान लेता है कि शरीर बदलता है लेकिन आत्मा नहीं, तब जीवन के प्रति उसका दृष्टिकोण बदल जाता है।
गीता के अनुसार 24 तत्त्व
सांख्य दर्शन और गीता के अनुसार प्रकृति के 24 प्रमुख तत्त्व माने गए हैं—
5 महाभूत
5 ज्ञानेन्द्रियाँ
5 कर्मेन्द्रियाँ
5 इन्द्रिय-विषय
मन
बुद्धि
अहंकार
अव्यक्त (मूल प्रकृति)
इन 24 तत्त्वों से सम्पूर्ण भौतिक जगत की रचना होती है।
निष्कर्ष
श्रीमद्भगवद्गीता हमें सिखाती है कि हमारा शरीर, मन, बुद्धि और संसार प्रकृति (क्षेत्र) हैं, जबकि इन्हें जानने वाली आत्मा पुरुष (क्षेत्रज्ञ) है। जब मनुष्य इस सत्य को समझ लेता है, तब उसका जीवन ज्ञान, वैराग्य और आत्मिक शांति की ओर अग्रसर हो जाता है।
गीता का संदेश स्पष्ट है—हम शरीर नहीं, बल्कि शाश्वत आत्मा हैं। यही आत्मज्ञान जीवन का सबसे बड़ा ज्ञान है।
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